बढता चैनलवाद घटती नैतिकता
आज के वर्त्तमान समय अगर एक मिनट के लिए भी हम खुद को मीडिया से अलग कर के या बिना मीडिया के समाज कि कल्पना करे तो निश्चय ही इससे भयावह कुछ नहीं हो सकता है। मानव समाज के रहन सहन से लेकर , खान - पान , वेश भूषा शिक्षा , रोजगार समाज का कोई भी क्षेत्र इसके बिना अधूरा है। हमारी छोटी - मोटी जरुरतो से लेकर बड़ी - बड़ी आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए हमें मीडिया कि जरुरत पड़ती है। विश्व हो या भारत सुरुआती दिनों में मीडिया इतना प्रभावी नहीं हुआ करता था जितना अभी है। क्योकि अगर हम विश्व स्तर पर समाचार पत्रो कि बात करे तो प्रारम्भ में मीडिया का मतलब सिर्फ समाचार पत्र हुआ करता था , और ये समाचार पत्र हर समाचार को प्रमुखता से छापते भी नहीं थे। अगर हम बात भारतीय परिप्रेक्ष्य में करे तो भारत का पहला समाचार पत्र जो कि एक ब्रिटिशर द्वारा प्रकाशित किया गया था , जिसका नाम जेम्स आगस्टस हिक्की था। और इस समाचार पत्र का नाम बंगाल एडवर्टिजर या हिक्की गजट था।
इस समाचार पत्र के बारे में भारतीय जनमानस को इस लिए बहुत कुछ मालूम न था क्योकि ये समाचार पत्र अंग्रेजी में प्रकाशित होता था। भारत में आजादी के पहले तक प्रकाशित होने वाले पत्रो का सिर्फ एक उद्देश्य हुआ करता था , देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद कराना, पर जैसे ही आजादी के बाद दूरदर्शन का पदार्पण हुआ मीडिआ का उद्देश्य धीरे - धीरे बदलने लगा। अब मीडिया सूचना के साथ लोगो के मनोरंजन करने का का भी जिम्मा उठा ली । आजादी बाद देश में निजीकरण का तेजी से विकास हुआ , और देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार ने भी इस तरफ अपना ध्यान केंद्रित किया।
मीडिया और नैतिकता कि बात करे तो १९९० के पहले देश में सिर्फ एक ही चैनल हुआ करता था , और ये चैनल पब्लिक अथार्टीय द्वारा संचालित होता था , अतः अनैतिकता , अपराध , पक्षपात जैसे बातो को भारतीय मीडिया में सुनाने को नहीं मिलता था। 1990 के बाद जब देश वैश्वीकरण कि दुनिया में प्रवेश किया तो देश कि पूरी तस्वीर ही बदल गयी। देश में तेजी से प्राईवेट चैनलो के द्वार खुले और एक के बाद एक नए समाचार चैनल से लेकर मनोरंजक चैनल अस्तित्व में आने लगे। अब तक तो सूचना देना व मनोरंजन करना दूरदर्शन का काम हुआ करता था अब उसके कई विकल्प आ गए थे। इन चैनलो में खासकर जी न्यूज़ , आज तक , स्टार न्यूज़ , व एन डी टी वी न्यूज़ चैनल थे। इन चैनलो ने समाज के लोगो को अपने आकर्षक प्रस्तुतीकरण व एंकरिंग से काफी प्रभावित किया , और लोग दूरदर्शन को थका घोड़ा मान , इन फुर्तीले व तेज तरार घोड़ो कि सवारी करने लगे।
अब तक जो एक या दो घंटे दूरदर्शन समाचार दिखाया करता था प्राईवेट चैनलो ने ४ - ५ घंटे सिर्फ समाचार व आगे चल कर २४ * ७ का टैग लाइन अपने चैनलो को देने लगे। जाहिर सी बात है जब हम २४ घंटे समाचार दिखाने कि बात करेंगे तो निश्चय ही समाचार ढूंढने कि जगह पत्रकार व बड़े समाचार चैनलो ने समाचार बनाने के लिए पत्रकारो पर प्रेसर करने लगे। चैनलो कि टी आर पी बढ़ाने के लिये चैनल ऐसे - ऐसे समाचारो को व सूचनाओ को देना चालु कर दिया जिससे नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाने लगे। कहने को तो ये किसी राजनैतिक पार्टी को सपोर्ट नहीं करते थे पर चुनावी बिगुल बजते ही उनके प्रचार प्रसार में लग जाते है। चैनलो में समय के साथ जो एक नया बुखार चढ़ा है ,वो है एक्सक्लूसिव समाचार का। एक्सक्लूसिव समाचार दिखाने के नाम पर मीडिया घरानो ने लोगो के दिमाग में दर पैदा करने लगे व उससे छुटकारा पाने के लिये विभिन्न प्रकार के धातुओ को पहनने कि सलाह देने लगे। पांच दिन में गोरा होना , सात दिन में पतला होना ऐसे तमाम झूठ व फरेब के धंधो को प्रमुखता से चैनल वालो ने दिखाना शुरू कर दिया।
समाज हित व सामजिक जिम्मेदारियों को , तो ये कही पीछे छोड़ दिए अब इनका सिर्फ एक उद्देश्य हो गया है और वो है पैसा बनाना। और आज उसके लिए क्या नैतिक , क्या अनैतिक ? क्या अपराध ? क्या शिष्टाचार सब एक बराबर दिखने लगा। मीडिया में आ रहे तेजी से बदलाव व उसके प्रति जनमानस कि बदलती सोच न केवल मीडिया कि विष्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है , बल्कि उसके कार्य प्रणाली पर भी शक कि सुई घूमती है।
आज जो धीरे - धीरे लोगो के मन में एक बात घर कर रही है , वो है विश्वास कही न कही लोगो का विश्वास मीडिया से हट रहा है या कम हो रहा हैं। अगर समय रहते मीडिया अपनी नैतिक पहलुओ पर ध्यान नहीं देती है तो , वो दिन दूर नहीं जब लोगो कि आवाज कही जाने वाली मीडिया को , सिर्फ एक पैसा कमाने का माध्यम कहा जाएगा।



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