समाचार, विज्ञापन व चिट फंड.......
भारत के दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) ने टेलीविजन चैनलों से एक घंटे में बारह मिनट से ज्यादा विज्ञापन न दिखाने के नियम का पालन करने को कहा तो वे बौखला गए और उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार करने के अपने संवैधानिक अधिकारों के हनन का मामला बताकर आसमान सर पर उठा लिया। अधिकांश दर्शक ट्राइ की इस पहलकदमी से खुश हैं लेकिन टेलीविजन मालिकों के पक्ष में बोलने वाली संस्थाएं और व्यक्ति इसका विरोध कर रहे हैं। एक साल पहले भी ट्राइ ने इस सिलसिले में एक अधिसूचना जारी की थी लेकिन तब टेलीविजन चैनल इसको लटकाने में कामयाब हो गए थे। इस बार भी अगर चैनल मालिक कामयाब हो गए तो यह बहुसंख्यक दर्शकों के लिए नुकसानदेह साबित होगा। सरकार फिलहाल हवा का रुख भांप रही है।
ट्राई ने मार्च दो हजार बारह में एक विस्तृत कंसल्टेशन पेपर जारी किया था। उसमें टेलीविजन से जुड़े हर पक्ष के विचारों को आमंत्रित किया गया। दर्शकों से लेकर मालिकों तक का पक्ष सुना गया। सारे सुझाव आने पर दो महीने बाद ट्राइ ने टेलीविजन चैनलों में विज्ञापनों की समय सीमा निर्धारित करने के लिए ‘स्टैंडर्ड्स ऑफ क्वालिटी ऑफ सर्विस’ (ड्यूरेशन ऑफ एडवरटीजमेंट इन टेलीविजन चैनल्स) रेग्युलेशन, 2012 जारी किया। तब भी टेलीविजन मालिकों ने इसका खुलकर विरोध किया और वे टेलीकॉम से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए बने टेलीकॉम डिस्प्यूट सेटलमेंट एंड अपीलेट ट्रिब्यूनल (टीडीएसएटी) में अपील के लिए चले गए। आखिरकार टीडीएसएटी ने भी टीवी दर्शकों के हक में फैसला दिया और उसके बाद ट्राइ ने फिर से अधिसूचना जारी की। इस साल बाईस मार्च को जारी नई अधिसूचना स्टैंडर्ड्स ऑफ क्वालिटी ऑफ सर्विस (ड्यूरेशन ऑफ एडवरटीजमेंट इन टेलीविजन चैनल्स) (एमेंडमेंट) रेग्युलेशन, 2013 यानी सेवाओं के मानकों की गुणवत्ता (टेवीविजन चैनलों में विज्ञापनों की, (संशोधित नियम), समय सीमा, के नाम से है।
ट्राइ की कोशिश और मालिकों की ताकत
ट्राइ ने कहा है कि टेलीविजन चैनल हर तिमाही में अपने टीवी विज्ञापनों का हिसाब उसे दिखाएं। बारह मिनट से ज्यादा विज्ञापन दिखाने पर उन पर कार्रवाई की जा सकती है। ट्राइ के फैसले से बौखलाए मालिक सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश में लगे हैं। वे सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी से मिलकर अपना रोना रो चुके हैं। फिलहाल सरकार ने इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है। टेलीविजन मालिकों के इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) जैसी संस्थाएं अपने पक्ष में लॉबिंग करने का कोई रास्ता नहीं छोड़ रही हैं। समाचार माध्यमों से जुड़े होने की वजह से एनबीए मालिकों की अगुवाई कर रहा है। उसने अपने कई पिट्ठू संपादकों और पत्रकारों को भी पर्दे के पीछे से इस काम में लगा रखा है। इसी का नतीजा है कि मध्य अप्रैल के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने इस सिलसिले में सार्वजनिक बयान दिया जो इस सिलसिले में सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है, उनका कहना है कि ”क्या आप नियम लागू करने की प्रक्रिया में उसी को खत्म कर देना चाहते हैं जिसके लिए नियम बनाने जा रहे हैं?” (आर यू रियली गोइंग टु किल द गूज इन द प्रोसेस ऑफ इम्प्लीमेंटिंग रूल्स? द हिंदू, 18 अप्रैल)।
टेलीविजन मालिक मुख्य तौर पर तीन बातों पर ट्राइ के नियमन का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ट्राइ के नियम संविधान प्रदत्त उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार करने के अधिकार, 19 (1) (ए) और (जी) का उल्लंघन करते हैं। वे सफेद झूठ बोल रहे हैं। ट्राइ चैनलों के कार्यक्रमों और उनकी विषयवस्तु के नियमन की बात कर ही नहीं रहा है। इस लिहाज से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का मामला यहां सिरे से खारिज हो जाता है। ट्राइ तो सिर्फ उपभोक्ताओं को बेहतर सेवा देने की वकालत कर रहा है। जिससे वे आराम से टीवी के कार्यक्रम देख पाएं, बीच में अनावश्यक तौर पर बड़े-बड़े विज्ञापनों से उन्हें दिक्कत न हो। कुल मिलाकर दर्शकों को एक उपभोक्ता के तौर पर बेहतर सेवा मिले। ट्राइ इसमें कुछ नया भी नहीं कह रहा है। इसके लिए उसने सरकार की तरफ से 1994 से चले आ रहे केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल:1994 को आधार बनाया है। जिसमें स्पष्ट तौर पर टेलीविजन उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए एक घंटे में बारह मिनट के विज्ञापनों की समय सीमा तय की गई है। इन बारह मिनटों में भी दस मिनट विज्ञापनों के लिए और दो मिनट चैनल के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इतने साल तक सारे निजी चैनल इस नियम की अवहेलना करते हुए एक तरह से अपराध करते रहे हैं। अब, जब उन्हें इस अपराध की याद दिलाई जा रही है तो वे इसे स्वीकारने के लिए ही तैयार नहीं। वे उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर खुद को सही ठहराने की कोशिशों में लगे हैं। यह पूरी तरह हास्यास्पद तर्क है कि ट्राइ का नियम मालिकों के व्यापार करने के अधिकारों का उल्लंघन है। क्योंकि मालिक जब सारी सरकारी औपचारिकताओं को पूरा करते हैं तभी उन्हें चैनल चलाने का लाइसेंस मिलता है। इस लिहाज से टेलीविजन चैनल का लाइसेंस लेने से पहले केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल की शर्तों को मानना मालिकों की बाध्यता रही है लेकिन उन्होंने कभी उन्हें माना नहीं।
चैनल मालिकों को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो नजर आती है लेकिन एक घंटे में तीस से चालीस मिनट विज्ञापन दिखाकर वे जिस तरह दर्शकों के अधिकारों का हनन करते हैं वह उन्हें दिखाई नहीं देता। अब अपने ऊपर खतरा देख टीवी मालिक कहने लगे हैं कि ट्राइ के पास इस तरह के नियमन का कोई अधिकार नहीं है। इसमें भी झूठ के अलावा और कुछ नहीं है। सन् 2004 में संचार और सूचना तकनीक मंत्रालय ने अपनी एक अधिसूचना में कहा कि ”प्रसारण सेवाएं और केबल सेवाएं, दूरसंचार सेवाएं होंगी”। इस लिहाज से टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों की अवधि दर्शकों के देखने के अनुभव की गुणवत्ता से जुड़ती हैं और यह अनुभव, उन्हें मिलने वाली सेवा की गुणवत्ता से जुड़ा है। जिसका पालन उपभोक्ता को सेवा प्रदान करने वाले प्रसारकों को करना होगा। इससे साफ हो जाता है कि ट्राइ को विज्ञापनों की अवधि तय करने का पूरा अधिकार है। यही वजह है कि टीडीएसएटी ने भी ट्राइ को उपभोक्ताओं के पक्ष में नियमन करने की हरी झंडी दी है। ट्राइ की अधिसूचना के खिलाफ टेलीविजन मालिक एक और तर्क देते हैं कि विज्ञापन ही उनके व्यापार का मुख्य आधार हैं। विज्ञापन कम होने पर उनके लिए धंधा चलाना मुश्किल हो जाएगा। वे बहाने बनाते हैं कि प्रसारण का पूरी तरह से डिजिटलीकरण न होने की वजह से केबल ऑपरेटरों को उन्हें बहुत सारा पैसा चुकाना पड़ता है। पूरा उद्योग मंदी की मार झेल रहा है, वगैरह-वगैरह।
यह स्थापित तथ्य है कि मीडिया जनता की राय बनाने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में हमारे निजी चैनल क्या दिखाते हैं? जरूरत तो इस बात की है कि टेलीविजन समेत पूरे मीडिया में विषयवस्तु से लेकर मालिकाने तक पर ठोस कायदे-कानून बनें। लेकिन जब भी नियमन की बात होती है चालाक मालिक नियमन का अर्थ बदलकर उसे सरकारी नियंत्रण बना देते हैं और पूरी बहस को सरकारी नियंत्रण बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बदल देते हैं। अगर टेलीविजन चैनलों को अंधविश्वास और सांप्रदायिक हिंसा फैलाने, फूहड़ कार्यक्रम दिखाने से रोका जाए तो इसमें क्या गलत हैं? असली बात तो यह है कि निजीकरण के दौर में सरकारें भी अपने नियमों को कड़ा नहीं करना चाहतीं। उदारीकरण की अर्थव्यवस्था का मतलब ही यही है कि इसमें उद्योगपतियों के हितों को ध्यान में रखकर कायदे-कानून की बात कम से कम हो। कुछ नियम हों भी तो वे सिर्फ दिखावे के हों और ऐसा लगे कि सरकार और निजी उद्योगपति एक दूसरे से संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन यह दोनों के बीच होने वाली नूरा कुश्ती से ज्यादा कुछ भी नहीं होती। वरना टेलीविजन को लेकर, ऐसा नहीं है कि कोई कायदे-कानून नहीं हैं, केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल के मुताबिक कोई भी चैनल अपने कार्यक्रमों और विज्ञापनों में अंधविश्वास फैलाने, जाति, धर्म, लिंग और उम्र के आधार पर भेदभाव फैलाने वाली विषयवस्तु नहीं दिखा सकता है। वास्तविकता यह है कि हमारे टेलीविजन चैनलों में जनविरोध पर आधारित इस सब की ही भरमार ज्यादा देखने को मिलती है। हर चैनल नियमों का खुलेआम उल्लंघन करता है, अपराध करता है। उनके कार्यक्रमों में भविष्य बताने वाले पाखंडी जोगियों से लेकर गोरेपन की क्रीम बेचने वाले रंगभेदी विज्ञापन धड़ल्ले से दिखाए जाते हैं और हमारी लोकतांत्रिक सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती है। स्वनियमन की बेशर्म वकालत करने वाले मालिकों की जेबी संस्थाएं भी इस स्थिति से हमेशा आंखें मूंदे रहती हैं। लेकिन जब-जब इन स्थितियों में बदलाव की मांग उठने लगती है तो सरकार और उद्योगपतियों की तरफ से यही सुनने को मिलता है कि जैसे इन हालात पर उनसे ज्यादा चिंतित और कोई नहीं।
विज्ञापनों का प्रतिशत और समाचार माध्यम
समाचार माध्यमों में कितने विज्ञापन होने चाहिए भारत में यह बहस काफी पुरानी है। टीवी के देश में इतना प्रचलित होने से बहुत पहले प्रिंट माध्यम को लेकर भी यह बहस रही है। पचास के दशक की शुरुआत में पहले प्रेस आयोग ने पाठकों के हितों को ध्यान में रखते हुए अखबार में कम से कम साठ फीसदी समाचार और ज्यादा से ज्यादा चालीस फीसदी विज्ञापन छापने की वकालत की थी। इसे ध्यान में रखकर बाद में द न्यूजपेपर (प्राइस एंड पेज) एक्ट 1956 बनाया गया। मीडिया मालिकों ने तब भी तमाम किस्म की जोड़-तोड़ के बाद, यहां तक कि कोर्ट का सहारा लेते हुए भी इसे लागू नहीं होने दिया। यही वजह है कि आज यह बीमारी सारे संचार माध्यमों में फैल चुकी है। जब-जब भी मीडिया के नियमन की बात की जाती है मालिक लोग तुरंत ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समेत कई किस्म के विचित्र बहानों को लेकर सामने आ जाते हैं और संचार माध्यमों पर नियंत्रण के कारण कामयाब भी रहते हैं। इसने मीडिया की अराजकता को इन वर्षों में बढ़ाया ही है। आज जिस तरह से प्रिंट, टीवी, रेडियो और इंटरनेट का जितना असीम विस्तार हुआ है उसे देखते हुए मीडिया परिदृश्य के लिए कुछ ठोस कायदे-कानूनों का होना जरूरी हो गया है अन्यथा स्वयं मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग के चलते खुद लोकतंत्र के लिए खतरे में बदल गया है। पेड न्यूज और मास मीडिया पर अवांछित तत्वों का बढ़ता स्वामित्व इसका उदाहरण है। इसे हाल के शारदा चिट फंड घोटाले के माध्यम से भी समझा जा सकता है जिसने अखबारों और चैनलों के माध्यम से जनता को ठगने और सत्ताधारियों व राजनीतिक नेतृत्व को सफलता पूर्वक प्रभावित करने का काम किया है।
आज मीडिया के जनता को प्रभावित करने से लेकर सत्ता और सरकारों को प्रभावित करने के विभिन्न पहलू को ध्यान में रखते हुए उसके संपूर्ण नियमन की तत्काल जरूरत है। हाल के दौर में बड़े-बड़े पूंजी संगठन सभी तरह के मीडिया में पैसा लगाकर उस पर कब्जा करने या स्वयं बड़े मीडिया संस्थान एकाधिकार का विस्तार करने में लगे हैं। इस साल ट्राइ ने ही मीडिया के मालिकाने के नियमन के लिए दूसरी बार एक और कंसल्टेशन पेपर जारी किया था। इसमें बड़े-बड़े मीडिया कांग्लोमरेटों की तरफ से क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर कुछ रोक लगाने की वकालत की गई है। मध्य फरवरी में जारी किए गए इस पेपर पर सभी हिस्सेदारों की तरफ से जवाब देने की आखिरी तारीख बाईस को खत्म हो गई है। एक बार फिर मीडिया मालिक मालिकाने के नियमन के खिलाफ एकजुट हैं। इससे पहले भी ट्राइ मई 2008 में एक कंसल्टेशन पेपर जारी कर चुका है और मालिक उसे गलत ठहराने की कोशिश करते रहे हैं। अगर जनता का दबाव रहा तो एक न एक दिन सरकार को अपना ढुलमुल रवैया छोड़कर नागरिकों के पक्ष में नियम बनाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा लेकिन फिलहाल ऐसी कोई सूरत नहीं दिखती है।
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि मीडिया को बाजार और मुनाफे का पर्याय बनाए जाने की वजह से ही वर्तमान मीडिया परिदृश्य बना है, जिसमें लोगों को एक नागरिक के तो छोड़ दीजिए उपभोक्ता के अधिकार पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। दूसरी ओर एकाधिकार बढ़ा है और समाचार माध्यमों के स्तर में गिरावट आई है।
चिट फंड घोटाला और समाचार
इस संदर्भ में पश्चिम बंगाल में सक्रिय शारदा चिट फंड कंपनी की वजह से राज्य की राजनीति में मचे तूफान पर नजर डालना जरूरी है। कंपनी हजारों जमाकर्ताओं के खून पसीने की कमाई डुबा चुकी है। उसके मालिकों और राज्य की तृणमूल सरकार व कांग्रेस के कुछ नेताओं के संबंध सामने आ चुके हैं। इस मामले में भी राडिया कांड की तरह ही आर्थिक घोटाले, मीडिया और राजनीति का घातक घालमेल सामने है। बाजार में अपनी छवि बनाए रखने के लिए इस चिट फंड ग्रुप ने अपने अवैध काम को आसानी से चलाने के लिए जनता से वसूले गए पैसे का बड़ा हिस्सा समाचार माध्यमों में लगाया था। अंग्रेजी अखबार बंगाल पोस्ट समेत यह कंपनी, सकालबेला, आजाद हिंद, प्रभात वार्ता, सेवन सिस्टर्स पोस्ट, तारा न्यूज, तारा म्यूजिक और तारा बंगला जैसे कई अखबार और टेलीविजन चैनल चलाती थी।
कंपनी के अंग्रेजी अखबार बंगाल पोस्ट के दिल्ली ब्यूरो में काम कर चुकी सीमा गुहा ने टू हूट वेबसाइट में अपने अनुभवों को विस्तार से लिखा है। उनका कहना है कि मालिक सुदीप्तो सेन खुलेआम उनको तृणमूल का पक्षधर होने की अपनी बाध्यता बताता था और तृणमूल एमपी कुनाल घोष के माध्यम से वह मीडिया संस्थान के लिए पैसा जुटाने की कोशिश कर रहा था। अब भले ही कुणाल घोष का कहना हो कि वह सिर्फ कंपनी का पेड कर्मचारी था लेकिन इस पत्रकार ने अपने अनुभवों से बताया है कि घोष इस ग्रुप के साथ बहुत गहराई से जुड़ा रहा है।
शारदा का तो आखिरकार भड़ा-फोड़ हो गया है और उसके मालिक अब कानून की गिरफ्त में हैं। लेकिन एक और चिट फंड कंपनी और अनऔपचारिक वित्तीय धंधा करनेवाली कंपनी सहारा के खिलाफ भी सेबी लगातार आवाज उठा रही है। शारदा की तरह ही सहारा पर भी वित्तीय अनियमित्तताओं के आरोप हैं जिनकी जांच चल रही है। कोर्ट ने उसे छोटे जमाकर्ताओं का चौबीस हजार करोड़ रुपया लौटाने को कहा है लेकिन सहारा का मालिक अब भी जोड़-तोड़ कर बचने की कोशिश में लगा हुआ है। ये दोनों प्रसंग अवांछित तौर पर पैसा कमाने में लगे संस्थानों के मीडिया का इस्तेमाल करने का बड़ा उदाहरण हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि सहारा स्वयं एक बड़ा मीडिया संस्थान चलाता है।
सच यह है कि सरकारों को इस तरह की कंपनियों की गतिविधियों के बारे में सब मालूम रहता है लेकिन वे जानबूझ कर इनके खिलाफ कोई कार्रवाही नहीं करतीं। इसकी कई वजहें होती हैं। जनता से पैसा ठग कर उसे राजनेओं को देने से लेकर राजनेताओं द्वारा कमाए काले पैसे को सफेद करने या उसे रखने का काम करने तक। ये कंपनियां शारदा और सहारा की तरह विश्वसनीयता हासिल करने के लिए मीडिया में निवेश करती हैं। इससे पहले नब्बे के दशक में कुबेर और जेवीजी जैसी चिट फंड कंपनियां जनता की गाढ़ी कमाई को लूटकर गायब हो गई थीं। उन्होंने भी मीडिया का इस्तेमाल करने के लिए कुबेर टाइम्स और जेवीजी टाइम्स जैसे अखबार शुरू किए थे। चिट फंड का साम्राज्य डूबने के साथ ही ये अखबार भी डूब गए। जिसके बाद बड़ी संख्या में पत्रकार बेरोजगार हो गए थे। उसी तरह अब शारदा ग्रुप में काम करने वाले करीब डेढ़ हजार पत्रकार सड़क पर आ गए हैं। मीडिया में इधर बिल्डरों ने भी बड़े पैमाने पर निवेश किया है। आज कई ऐसे चैनल और पत्र-पत्रिकाएं हैं जो बिल्डरों और डेवलपर्स की हैं। चिट फंड व अनौपचारिक वित्तीय संस्थाओं तथा बिल्डरों-डेवलपर्स में निकट का संबंध है।
इस घटना के सामने आने से निजी मीडिया स्वामित्व के नियमन का मुद्दा एक बार फिर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। आखिर चिट फंड कंपनियों को मीडिया में निवेश करने की इजाजत क्यों होनी चाहिए या किसी भी दूसरे धंधे में जुटी कंपनी को मीडिया, खास तौर पर समाचार मीडिया में निवेश की इजाजत क्यों होनी चाहिए? क्या ऐसा होने पर समाचार मीडिया की स्वतंत्रता संभव है? क्या व्यापारी घराने मीडिया का इस्तेमाल निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे? करते? जैसे, क्या शारदा ग्रुप के पत्रकार अपने मालिक की करतूतों के खिलाफ अपने मीडिया में रिपोर्ट कर सकते थे? क्या वे मालिक के करीबी तृणमूल कांग्रेस की नीतियों की आलोचना कर सकते थे? या उस तरह से किसी भी शासक दल के खिलाफ कोई चिटफंड कंपनी बोलने की हिम्मत रख सकती है? इस तरह मीडिया में मालिकाने के नियमन का सवाल राजनीति और आर्थिक कारोबार के कायदों से भी जुड़ा है। इस असलियत की अनदेखी की जाती रही तो वह दिन दूर नहीं होगा जब देश मीडिया पर ऐसे लोगों का कब्जा हो जाएगा जिनकी आर्थिक गतिविधियां सदा शंकास्पद रहेंगी औरजो इन माध्यमों के माध्यम से आप जनता को ठगने का काम कर रहे होंगे।
मीडिया नियमन इसलिए भी जरूरी है कि बड़े व्यापसायिक घरानों द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया पर कब्जे के कारण और उनके और उनकी सहयोगी राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ कभी कोई ऐसी खबर नहीं आ पाएगी जो सच होने के बावजूद इन के खिलाफ हो। इस बात की शुरुआत मुकेश अंबानी ने नेटवर्ट 18 और इनाडु टीवी को हथिया कर और आदित्य बिड़ला ग्रुप ने टीवी टुडे ग्रुप के सत्ताईस फीसदी शेयर खरीदकर कर दी है। मुकेश के छोटे भाई अनिल अंबानी का भी कई मीडिया संगठनों में पैसा लगा है। पत्रकारों की एकजुटता बहुत हद तक इस स्थिति से उन्हें और पत्रकारीय नैतिकता को बचा सकती है, उनकी सांगठनिक ताकत मालिकों के सामने झुकने से मना कर सकती है। लेकिन हाल के दौर में जिस तरह मालिकों ने कुछ पत्रकारों को बड़ी-बड़ी तनख्वाह देकर खरीद लिया है, इस स्थिति ने पत्रकारों के संगठन बनाने की बात को ही हास्यास्पद बना दिया है। यही वजह है कि आज ज्यादातर मीडिया संस्थानों में पत्रकार संगठन की बात करना पूरी तरह वर्जित है। ठेके पर काम करने की वजह से उन्हें हमेशा नौकरी जाने का डर लगा रहता है और वे न्याय के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठा पाते। पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा करने वाले वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट का नाम भी आज कई पत्रकार नहीं जानते। पत्रकार संगठनों को अवांक्षित घोषित कर निजी मीडिया संस्थानों और सरकार ने मिलकर एक तरह से पत्रकारों को रीढ़ विहीन बना रखा है।






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