Wednesday, 30 October 2013

                                            बढता चैनलवाद घटती नैतिकता 


आज के वर्त्तमान    समय अगर एक मिनट के लिए भी हम  खुद को मीडिया से अलग कर के या बिना मीडिया के समाज कि कल्पना करे तो निश्चय ही इससे भयावह कुछ नहीं हो सकता है।  मानव समाज के रहन सहन से लेकर , खान - पान , वेश भूषा शिक्षा  , रोजगार समाज का कोई भी क्षेत्र इसके बिना अधूरा है।  हमारी छोटी - मोटी जरुरतो से लेकर बड़ी - बड़ी आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए   हमें मीडिया कि जरुरत पड़ती है।  विश्व हो या भारत सुरुआती दिनों में मीडिया इतना प्रभावी नहीं  हुआ करता था जितना अभी है।  क्योकि अगर हम  विश्व स्तर  पर समाचार पत्रो कि बात करे तो प्रारम्भ में मीडिया  का मतलब सिर्फ समाचार पत्र हुआ करता था , और ये समाचार पत्र हर समाचार को प्रमुखता से छापते  भी नहीं थे।  अगर हम  बात भारतीय परिप्रेक्ष्य में करे तो भारत का पहला समाचार पत्र जो कि एक ब्रिटिशर द्वारा प्रकाशित किया गया था , जिसका नाम जेम्स आगस्टस हिक्की था।  और इस समाचार पत्र का नाम बंगाल एडवर्टिजर या हिक्की गजट था।  

   इस समाचार पत्र के  बारे में भारतीय जनमानस को इस लिए बहुत कुछ मालूम न था क्योकि ये समाचार पत्र अंग्रेजी में प्रकाशित होता था।  भारत में आजादी के पहले तक प्रकाशित होने वाले पत्रो का सिर्फ एक उद्देश्य हुआ करता था , देश को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद कराना, पर जैसे ही आजादी के बाद दूरदर्शन का पदार्पण हुआ मीडिआ का उद्देश्य धीरे - धीरे बदलने लगा।  अब मीडिया सूचना के साथ लोगो के मनोरंजन करने का का भी  जिम्मा उठा ली ।  आजादी बाद देश में निजीकरण का तेजी से विकास हुआ , और देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार  ने भी इस तरफ अपना ध्यान केंद्रित किया।
  


   मीडिया और नैतिकता कि बात करे तो १९९० के पहले देश में सिर्फ  एक ही चैनल  हुआ करता था , और ये चैनल पब्लिक अथार्टीय  द्वारा संचालित होता था , अतः अनैतिकता , अपराध , पक्षपात जैसे बातो को भारतीय मीडिया में सुनाने को नहीं मिलता था।  1990 के बाद जब देश वैश्वीकरण कि दुनिया में प्रवेश किया तो देश कि पूरी तस्वीर ही बदल गयी। देश में तेजी से प्राईवेट चैनलो के द्वार खुले और एक के बाद एक नए समाचार चैनल से लेकर मनोरंजक चैनल अस्तित्व में आने लगे।  अब तक तो सूचना देना व मनोरंजन करना दूरदर्शन का काम हुआ करता था अब उसके कई विकल्प आ गए थे।  इन चैनलो में खासकर जी न्यूज़ , आज तक , स्टार न्यूज़ , व एन डी टी वी  न्यूज़ चैनल थे।  इन चैनलो ने  समाज के लोगो को अपने आकर्षक  प्रस्तुतीकरण व एंकरिंग से काफी प्रभावित किया , और लोग दूरदर्शन  को थका घोड़ा मान , इन फुर्तीले व तेज तरार घोड़ो कि सवारी करने लगे। 

     अब तक जो एक या दो घंटे दूरदर्शन समाचार दिखाया करता था प्राईवेट चैनलो ने ४ - ५ घंटे सिर्फ समाचार व आगे चल कर २४ * ७ का टैग लाइन अपने चैनलो को देने लगे।  जाहिर सी बात है जब हम  २४ घंटे समाचार दिखाने कि बात करेंगे तो निश्चय ही समाचार ढूंढने कि जगह पत्रकार व बड़े समाचार चैनलो ने समाचार बनाने के लिए पत्रकारो पर प्रेसर करने लगे। चैनलो कि टी आर पी बढ़ाने के लिये चैनल ऐसे - ऐसे समाचारो को व सूचनाओ को देना चालु कर दिया जिससे नैतिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाने लगे।  कहने को तो ये किसी राजनैतिक पार्टी को सपोर्ट नहीं करते थे पर चुनावी बिगुल बजते ही उनके प्रचार प्रसार में लग जाते है।  चैनलो में समय के साथ जो एक नया बुखार चढ़ा है ,वो है एक्सक्लूसिव समाचार का।  एक्सक्लूसिव समाचार दिखाने के नाम पर मीडिया घरानो ने लोगो के दिमाग में दर पैदा करने लगे व उससे छुटकारा पाने के लिये विभिन्न प्रकार के धातुओ को पहनने कि सलाह देने लगे।  पांच दिन में गोरा होना , सात दिन में पतला होना ऐसे तमाम झूठ व फरेब के धंधो को प्रमुखता से चैनल वालो ने दिखाना शुरू कर दिया।  



     समाज हित व सामजिक जिम्मेदारियों को , तो ये कही पीछे छोड़  दिए अब इनका सिर्फ एक उद्देश्य हो गया है और वो है पैसा बनाना।  और आज उसके लिए क्या नैतिक , क्या अनैतिक ? क्या अपराध ? क्या शिष्टाचार  सब एक बराबर दिखने लगा।  मीडिया में आ रहे तेजी से बदलाव व उसके प्रति जनमानस कि बदलती  सोच न केवल मीडिया कि विष्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है , बल्कि उसके कार्य प्रणाली पर भी शक कि सुई घूमती है। 

   आज जो धीरे - धीरे लोगो के मन में एक बात घर कर रही है , वो है विश्वास कही न कही लोगो का विश्वास मीडिया से हट रहा है या कम हो रहा हैं।  अगर समय रहते मीडिया अपनी नैतिक पहलुओ पर ध्यान नहीं देती है तो , वो दिन दूर नहीं जब लोगो कि आवाज कही जाने वाली मीडिया को , सिर्फ एक पैसा  कमाने का माध्यम कहा जाएगा।  
                            social media unsocial people .......



सूचना क्रांति ने पुरे  विश्व  एक गावं में बदल दिया है। सूचना तंत्र के इस जाल ने खासकर इन्टरनेट हमारे जीने के तरीको में मनो एक नयी क्रांति ला दी हो। देश दुनिया में हो रहे परिवर्तन या नए आयामों से हम इन्टरनेट के माध्यम से रूबरू होते है। इन्टरनेट आधारित सोशल नेटवर्किंग साइट्स ( फेसबुक ट्विटर गूगल ) जहा हमें अपनो से दूर लोगो के साथ इंटरेक्शन करने का मौका देती है , वही आम इन्सान को सहभागी होने का अवसर भी देती है ।  सोशल नेटवर्किंग साइट्स अन्य जन माध्यमो के तुलना में कही ज्यादा ही प्रभावशाली है ,……. हो  भी न क्यों आखिर बात सहभागिता की जो है ?
       
   वर्तमान में  किसी भी लोकतान्त्रिक देश में आम आदमी का जो सबसे अहम् एवं प्रभावशाली हथियार है वो है सोशल नेटवर्किंग साइट्स।  पर आज हम इस हथियार को किस रूप में प्रयोग कर रहे है यह एक बड़ा प्रश्न है।  वास्तव में क्या हम ऐसे साइट्स को सोशल तरीके से प्रयोग कर रहे है ? संभवतः अगर इस पर सर्वे करे तो पाएंगे की अधिकतर लोग सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अनसोशल हरकत करते है।  वाणी एवं अभिव्यक्ति के नाम पर लोग अक्सर मनमानी करते है।  इसका उदहारण ऐसे साइट्स पर देखे जा सकते है।  समाज में बढ़ रहे अपराध , भ्रष्टाचार, महंगाई  इत्यादि ऐसे कई सामाजिक समस्याएँ है जिसके लिए हम सरकार को जिम्मेवार ठहराते है और कड़ी आलोचना करते है।  पर जिस तरह से हम रोष व्यक्त करते है क्या वो एक सोशल समाज को सोभा देती है ? देश के राजनेताओ के आपत्ति जनक फोटो एवं विडियो जिस तरह इन साइट्स पर देखे जाते है , उससे न केवल उनके सम्मान पर आंच आती है , वल्कि हमारे देश की छवि  भी अंतरराष्ट्रीय  स्तर पर  धूमिल होती है।  गाली - गलौज , अश्लीलता , हिन्स्सा इत्यादि ऐसे अनेक असामाजिक हरकत दिन प्रतिदिन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बढ़ रहें है , जो समाज के लिए चुनौती बनती जा रही।
 
 सोशल  नेटवर्किंग का  सबसे भयानक प्रभाव  जिस के  उपर देखने को  को मिलता है  वो है बच्चे व टीन एजर्स।  सोशल नेटवर्किंग से हमेशा जुड़े रहने से न केवल बच्चो का बेवजह समय बर्बाद होता है बल्कि तमाम अश्लील हरकतो का भी प्रभाव उनके ऊपर देखा जाता है।  जिस तरह सोशल नेवर्किंग साइट्स पर पोर्नोग्राफी व ऐसे  कई दूसरे  अश्लील हरकतो को बढ़ावा मिल रहा है , उससे बच्चो में विकृति कि धारणा तेजी से घर कर  रही है। हलाकि ऐसे हरकतो  को किसको जिम्मेदार ठहराया जाये ये भी कुछ कहा नहीं जा सकता क्योकि इसके लिए वो भी जिम्मेदार है , जो बेमतलब का अपने बच्चो को सब कुछ करने कि आजादी दे दी है , साथ ही वो लोग भी है जो अभी भी अपने बच्चो को आजादी से रहने नहीं देते।  अगर हम  बच्चो को छोड़ एक मिनट के लिए उनके बड़ो के बारे में सोचे तो कही न कही ऐसे साइट्स पर अनैतिक व अश्लील हरकत  कई बार वो  इसलिए करते है क्योकि उनके बड़े भी ऐसा करते है।

 आज सोशल नेटवर्किंग साइट्स को सहारा बना कर लोग सामाजिक दंगे व कभी - कभी देश के अंदर द्वेष कि भावना को तुल  देते है।  उलटा सीधा फ़ोटो अपलोड कर एक धर्म को दूसरे धर्म के खिलाफ गलत बताना तथा एक समुदाय के लोगो को दूसरे समुदाय के खिलाफ भड़काना आज कल सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आम बात हो गायी है।  लोग इसके महत्व्  व इसके अच्छाई को भूल गलत चीजो को तेजी से बढ़ावा दे रहे है जो कि न केवल एक समाज , एक देश बल्कि पूरे  विश्व के सामने चुनौती बनती जा रही है 

Thursday, 24 October 2013

                     
           भारतीय मीडिया और पेड न्यूज़…...



संसद की एक स्थायी समिति ने पेड न्यूज के मामले में जांच के बाद विस्तृत रिपोर्ट पेश की है। उसने पेड न्यूज के संदर्भ में मीडिया की मौजूदा स्थिति को लेकर चिंता जाहिर की है। लेकिन जनप्रतिनिधियों के विज्ञापनदाता के रूप में विकास और उसकी पूरी प्रक्रिया को समझने की उसने जहमत नहीं उठाई है।

समिति के अनुसार मीडिया लोकतंत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि धारणा बनी हुई है कि यह न केवल लोगों की समस्याओं को आवाज देता, बल्कि देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य की सही तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसलिए जरूरी है कि विभिन्न संचार माध्यमों- अखबार, रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, मोबाइल फोन- पर प्रकाशित-प्रसारित किए जाने वाले समाचार और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम तथ्यात्मक, निष्पक्ष, तटस्थ और विषयनिष्ठ हों। पर मीडिया के कुछ हिस्सों में व्यक्तियों, संगठनों, निगमों आदि के पक्ष में सामग्री प्रकाशित-प्रसारित करने की एवज में धनराशि या अन्य लाभ प्राप्त करना शुरू हो गया है, जिसे आमतौर पर ‘पेड न्यूज’ कहा जाता है। इस प्रवृत्ति का दुष्प्रभाव वित्तीय, प्रतिभूति, जमीन-जायदाद कारोबार, स्वास्थ्य क्षेत्र, उद्योगों आदि पर पड़ रहा है। निर्वाचन प्रक्रिया में जनमत भी प्रभावित हो रहा है।


यह तथ्य व्याकुल करता है कि ‘पेड न्यूज’ कुछ पत्रकारों के भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है, इसमें मीडिया कंपनियों के प्रबंधक, स्वामी, निगमें, जनसंपर्क कंपनियां, विज्ञापन एजेंसियां और कुछ राजनेता भी शामिल हैं। मीडिया का इस हद तक समझौतावादी होना चिंताजनक है। इस समस्या से पार पाने के लिए तत्काल व्यावहारिक उपाय करने की आवश्यकता है।

इस पृष्ठभूमि के साथ अपनी जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाली संसदीय समिति ने सांसदों, विधायकों की बदलती भूमिका और पेड न्यूज के नए रूप के साथ रिश्ते बनाने की प्रक्रिया पर ध्यान नहीं दिया है। बुनियादी तौर पर यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि भूमंडलीकरण की आर्थिक नीतियों ने लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं को बेपर्दा किया है। लेकिन सभी संस्थाएं बेशर्मी छिपाने या लोकलाज के कारण अपनी बला दूसरे के सिर डाल देती हैं। भारतीय प्रेस परिषद की उप-समिति की रिपोर्ट कहती है कि पेड न्यूज ‘खबर’ के वेश में भ्रष्टाचार का संस्थागत और संगठित रूप है। पर किसी भी समिति का काम केवल बीमारी की पहचान करना नहीं, बल्कि उसके मूल कारणों की तलाश करना होना चाहिए।


अगर अकादमिक अध्ययन के आधार पर पेड न्यूज की समस्या को समझने की कोशिश करें तो उसमें एक संदर्भ प्रथम प्रेस आयोग का आता है। उसकी रिपोर्ट बताती है कि दूसरे विज्ञापनदाताओं की तरह सरकार भी कैसे विज्ञापनों के जरिए प्रेस पर दबाव बनाती है। अगर 2008 के विधानसभा चुनाव से पहले विज्ञापनों पर सरकारी खर्चे के संबंध में लोकायुक्त के फैसले पर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की प्रतिक्रिया देखें तो एक नया पहलू उभरता है। उन्होंने कहा कि सरकार का हर तरह से हक बनता है कि वह अपनी उपलब्धियां विज्ञापित करे। यानी सरकार का विज्ञापन के रूप में प्रचार का हक और चुनाव के दौरान मालदार उम्मीदवारों द्वारा खबर के रूप में विज्ञापन के जरिए प्रचार को लेकर एक नई बहस खड़ी हो जाती है। जबकि हमें यह तलाशना है कि चुनावों में विज्ञापन की भूमिका क्यों बढ़ी है। क्यों कोई मीडिया कंपनी किसी राजनेता के पक्ष में मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिश करती है। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात है कि राजनेताओं की मतदाताओं को ठगने की प्रवृत्ति इस हद तक कैसे विकसित हुई।



दरअसल, राजनीतिक पार्टियां और उनके उम्मीदवार विज्ञापनदाता भी हैं और विज्ञापन की जरूरत भूमंडलीकरण की आर्थिक नीतियों और उससे बने वातावरण की देन है। पेड न्यूज एक राजनीतिक प्रश्न है। सब जानते हैं कि भूमंडलीकरण के कार्यक्रमों को लागू करने के साथ ही संसद और

उसके सदस्यों की संवैधानिक जिम्मेदारियों को बदल दिया गया। 1991 के बाद जन प्रतिनिधियों में होड़-सी लग गई कि वे ज्यादा से ज्यादा अपने नामों की पट््िटयां लगवाएं और दीवारें खड़ी करने, सड़कें बनाने जैसे कार्यों में अव्वल दिखें। एक तरह से जन प्रतिनिधियों को पूंजीवादी विज्ञापनदाता के रूप में खड़ा करने की सफल कोशिश की गई। ताजा उदाहरण उत्तराखंड में हुई त्रासदी के बाद का है। 27 जून, 2013 को दो सांसद वाहवाही लूटने के लिए समाचार चैनलों में लड़ते-झगड़ते दिखाई दिए। इस विज्ञापनदाता की तुलना परंपरागत अर्थों वाले विज्ञापनदाताओं से करें तो संसदीय राजनीति के साथ कुछ गहरे संकट के चिह्न दिखाई देते हैं।
विज्ञापन की प्रथा पूंजीवाद की सैद्धांतिक देन है। वह महज औद्योगिक उत्पादों की बिक्री के लिए प्रचार-प्रसार का एक तरीका नहीं है। संसदीय राजनीति में लोकसेवक के लिए जनसंपर्क की जगह पूंजीवादी मीडिया में विज्ञापन की जरूरत पैदा करना भी एक सैद्धांतिक देन है। यह भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से जुड़ती है। दूसरा, हमें इस पहलू पर विचार करना होगा कि पेड न्यूज की कीमत किस तरह आंकी जाती है। पेड न्यूज के बारे में अगर खबर के वेश में विज्ञापन है तो यह उसका बेहद सरलीकरण है। दरअसल, भाषा भूमंडलीकरण के आर्थिक कार्यक्रमों को लागू करने का एक दूसरा बड़ा औजार है। मीडिया के जरिए मतदाताओं को धोखे में रखने की प्रक्रिया को पेड न्यूज कह कर व्यक्त नहीं किया जा सकता।



मीडिया के बारे में कहा जाता है कि वह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है और उस पर लोगों का भरोसा रहा है। हालांकि पूरी दुनिया की तरह भारत में भी मीडिया का चरित्र शहरी और मध्यवर्गीय रहा है। भारतीय समाज का भरोसा लिखित और प्रकाशित सामग्री पर रहा है। यहां मीडिया में विज्ञापन और खबरों का फर्क करना भी असहज रहा है। विज्ञापनों के जरिए ठगी और बेईमानी आम है। उत्पाद के खरीदार को होने वाला आर्थिक नुकसान बहुत हद तक व्यक्तिगत हो सकता है, पर मतदाताओं के साथ धोखाधड़ी लोकतंत्र के विरुद्ध अपराध की श्रेणी में आता है।

मीडिया में खबरों का पेश किया जाना और उस पर लोगों का भरोसा कायम होना एक लंबे राजनीतिक, सामाजिक विकास की प्रक्रिया की देन है। लेकिन बाजारवाद का वास्तविक अर्थ यही है कि सारा कुछ बाजार में खड़ा किया जाता है। खबरों के ढांचे, खबरों की भाषा, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया की मान्यता और आखिरकार देश को चलाने वाली संसद के लिए ठगी के तरीकों से चुनाव संपन्न होना लोकतंत्र के खत्म होने के कगार पर खड़े होने का एलान जैसा है।

संसद की स्थायी समिति लिखती है कि हालांकि सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारतीय प्रेस परिषद, भारतीय निर्वाचन आयोग, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन, एडिटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया, प्रसार भारती जैसे सभी संगठनों, प्राधिकरणों और विभिन्न गणमान्य व्यक्तियों ने पेड न्यूज की समस्या को स्वीकार किया है और इसे रोकने के उपाय जुटाने पर बल दिया है। फिर भी यह जानकर आश्चर्य होता है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग इस कदाचार पर पूरी तरह मौन है। लेकिन समिति को यह भी दर्ज करना चाहिए कि किस तरह बड़े पैमाने पर करोड़पति और अरबपति उम्मीदवार मीडिया के जरिए मतदाताओं को ठगने की कोशिश करते हैं और खुद को जन-प्रतिनिधि होने का दावा भी कर लेते हैं। राजनीति पर पैसे का दबदबा कायम हुआ है। पेड न्यूज के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है और इसका राजनीतिक हल ही हो सकता है।

Wednesday, 23 October 2013

                                  समाचार, विज्ञापन व चिट फंड.......

 
भारत के दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) ने टेलीविजन चैनलों से एक घंटे में बारह मिनट से ज्यादा विज्ञापन न दिखाने के नियम का पालन करने को कहा तो वे बौखला गए और उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार करने के अपने संवैधानिक अधिकारों के हनन का मामला बताकर आसमान सर पर उठा लिया। अधिकांश दर्शक ट्राइ की इस पहलकदमी से खुश हैं लेकिन टेलीविजन मालिकों के पक्ष में बोलने वाली संस्थाएं और व्यक्ति इसका विरोध कर रहे हैं। एक साल पहले भी ट्राइ ने इस सिलसिले में एक अधिसूचना जारी की थी लेकिन तब टेलीविजन चैनल इसको लटकाने में कामयाब हो गए थे। इस बार भी अगर चैनल मालिक कामयाब हो गए तो यह बहुसंख्यक दर्शकों के लिए नुकसानदेह साबित होगा। सरकार फिलहाल हवा का रुख भांप रही है।
ट्राई ने मार्च दो हजार बारह में एक विस्तृत कंसल्टेशन पेपर जारी किया था। उसमें टेलीविजन से जुड़े हर पक्ष के विचारों को आमंत्रित किया गया। दर्शकों से लेकर मालिकों तक का पक्ष सुना गया। सारे सुझाव आने पर दो महीने बाद ट्राइ ने टेलीविजन चैनलों में विज्ञापनों की समय सीमा निर्धारित करने के लिए ‘स्टैंडर्ड्स ऑफ क्वालिटी ऑफ सर्विस’ (ड्यूरेशन ऑफ एडवरटीजमेंट इन टेलीविजन चैनल्स) रेग्युलेशन, 2012 जारी किया। तब भी टेलीविजन मालिकों ने इसका खुलकर विरोध किया और वे टेलीकॉम से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए बने टेलीकॉम डिस्प्यूट सेटलमेंट एंड अपीलेट ट्रिब्यूनल (टीडीएसएटी) में अपील के लिए चले गए। आखिरकार टीडीएसएटी ने भी टीवी दर्शकों के हक में फैसला दिया और उसके बाद ट्राइ ने फिर से अधिसूचना जारी की। इस साल बाईस मार्च को जारी नई अधिसूचना स्टैंडर्ड्स ऑफ क्वालिटी ऑफ सर्विस (ड्यूरेशन ऑफ एडवरटीजमेंट इन टेलीविजन चैनल्स) (एमेंडमेंट) रेग्युलेशन, 2013 यानी सेवाओं के मानकों की गुणवत्ता (टेवीविजन चैनलों में विज्ञापनों की, (संशोधित नियम), समय सीमा, के नाम से है।
ट्राइ की कोशिश और मालिकों की ताकत
ट्राइ ने कहा है कि टेलीविजन चैनल हर तिमाही में अपने टीवी विज्ञापनों का हिसाब उसे दिखाएं। बारह मिनट से ज्यादा विज्ञापन दिखाने पर उन पर कार्रवाई की जा सकती है। ट्राइ के फैसले से बौखलाए मालिक सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश में लगे हैं। वे सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी से मिलकर अपना रोना रो चुके हैं। फिलहाल सरकार ने इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है। टेलीविजन मालिकों के इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) जैसी संस्थाएं अपने पक्ष में लॉबिंग करने का कोई रास्ता नहीं छोड़ रही हैं। समाचार माध्यमों से जुड़े होने की वजह से एनबीए मालिकों की अगुवाई कर रहा है। उसने अपने कई पिट्ठू संपादकों और पत्रकारों को भी पर्दे के पीछे से इस काम में लगा रखा है। इसी का नतीजा है कि मध्य अप्रैल के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने इस सिलसिले में सार्वजनिक बयान दिया जो इस सिलसिले में सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है, उनका कहना है कि ”क्या आप नियम लागू करने की प्रक्रिया में उसी को खत्म कर देना चाहते हैं जिसके लिए नियम बनाने जा रहे हैं?” (आर यू रियली गोइंग टु किल द गूज इन द प्रोसेस ऑफ इम्प्लीमेंटिंग रूल्स? द हिंदू, 18 अप्रैल)।
टेलीविजन मालिक मुख्य तौर पर तीन बातों पर ट्राइ के नियमन का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि ट्राइ के नियम संविधान प्रदत्त उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार करने के अधिकार, 19 (1) (ए) और (जी) का उल्लंघन करते हैं। वे सफेद झूठ बोल रहे हैं। ट्राइ चैनलों के कार्यक्रमों और उनकी विषयवस्तु के नियमन की बात कर ही नहीं रहा है। इस लिहाज से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का मामला यहां सिरे से खारिज हो जाता है। ट्राइ तो सिर्फ उपभोक्ताओं को बेहतर सेवा देने की वकालत कर रहा है। जिससे वे आराम से टीवी के कार्यक्रम देख पाएं, बीच में अनावश्यक तौर पर बड़े-बड़े विज्ञापनों से उन्हें दिक्कत न हो। कुल मिलाकर दर्शकों को एक उपभोक्ता के तौर पर बेहतर सेवा मिले। ट्राइ इसमें कुछ नया भी नहीं कह रहा है। इसके लिए उसने सरकार की तरफ से 1994 से चले आ रहे केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल:1994 को आधार बनाया है। जिसमें स्पष्ट तौर पर टेलीविजन उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए एक घंटे में बारह मिनट के विज्ञापनों की समय सीमा तय की गई है। इन बारह मिनटों में भी दस मिनट विज्ञापनों के लिए और दो मिनट चैनल के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इतने साल तक सारे निजी चैनल इस नियम की अवहेलना करते हुए एक तरह से अपराध करते रहे हैं। अब, जब उन्हें इस अपराध की याद दिलाई जा रही है तो वे इसे स्वीकारने के लिए ही तैयार नहीं। वे उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर खुद को सही ठहराने की कोशिशों में लगे हैं। यह पूरी तरह हास्यास्पद तर्क है कि ट्राइ का नियम मालिकों के व्यापार करने के अधिकारों का उल्लंघन है। क्योंकि मालिक जब सारी सरकारी औपचारिकताओं को पूरा करते हैं तभी उन्हें चैनल चलाने का लाइसेंस मिलता है। इस लिहाज से टेलीविजन चैनल का लाइसेंस लेने से पहले केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल की शर्तों को मानना मालिकों की बाध्यता रही है लेकिन उन्होंने कभी उन्हें माना नहीं।


चैनल मालिकों को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो नजर आती है लेकिन एक घंटे में तीस से चालीस मिनट विज्ञापन दिखाकर वे जिस तरह दर्शकों के अधिकारों का हनन करते हैं वह उन्हें दिखाई नहीं देता। अब अपने ऊपर खतरा देख टीवी मालिक कहने लगे हैं कि ट्राइ के पास इस तरह के नियमन का कोई अधिकार नहीं है। इसमें भी झूठ के अलावा और कुछ नहीं है। सन् 2004 में संचार और सूचना तकनीक मंत्रालय ने अपनी एक अधिसूचना में कहा कि ”प्रसारण सेवाएं और केबल सेवाएं, दूरसंचार सेवाएं होंगी”। इस लिहाज से टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों की अवधि दर्शकों के देखने के अनुभव की गुणवत्ता से जुड़ती हैं और यह अनुभव, उन्हें मिलने वाली सेवा की गुणवत्ता से जुड़ा है। जिसका पालन उपभोक्ता को सेवा प्रदान करने वाले प्रसारकों को करना होगा। इससे साफ हो जाता है कि ट्राइ को विज्ञापनों की अवधि तय करने का पूरा अधिकार है। यही वजह है कि टीडीएसएटी ने भी ट्राइ को उपभोक्ताओं के पक्ष में नियमन करने की हरी झंडी दी है। ट्राइ की अधिसूचना के खिलाफ टेलीविजन मालिक एक और तर्क देते हैं कि विज्ञापन ही उनके व्यापार का मुख्य आधार हैं। विज्ञापन कम होने पर उनके लिए धंधा चलाना मुश्किल हो जाएगा। वे बहाने बनाते हैं कि प्रसारण का पूरी तरह से डिजिटलीकरण न होने की वजह से केबल ऑपरेटरों को उन्हें बहुत सारा पैसा चुकाना पड़ता है। पूरा उद्योग मंदी की मार झेल रहा है, वगैरह-वगैरह।
यह स्थापित तथ्य है कि मीडिया जनता की राय बनाने में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में हमारे निजी चैनल क्या दिखाते हैं? जरूरत तो इस बात की है कि टेलीविजन समेत पूरे मीडिया में विषयवस्तु से लेकर मालिकाने तक पर ठोस कायदे-कानून बनें। लेकिन जब भी नियमन की बात होती है चालाक मालिक नियमन का अर्थ बदलकर उसे सरकारी नियंत्रण बना देते हैं और पूरी बहस को सरकारी नियंत्रण बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बदल देते हैं। अगर टेलीविजन चैनलों को अंधविश्वास और सांप्रदायिक हिंसा फैलाने, फूहड़ कार्यक्रम दिखाने से रोका जाए तो इसमें क्या गलत हैं? असली बात तो यह है कि निजीकरण के दौर में सरकारें भी अपने नियमों को कड़ा नहीं करना चाहतीं। उदारीकरण की अर्थव्यवस्था का मतलब ही यही है कि इसमें उद्योगपतियों के हितों को ध्यान में रखकर कायदे-कानून की बात कम से कम हो। कुछ नियम हों भी तो वे सिर्फ दिखावे के हों और ऐसा लगे कि सरकार और निजी उद्योगपति एक दूसरे से संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन यह दोनों के बीच होने वाली नूरा कुश्ती से ज्यादा कुछ भी नहीं होती। वरना टेलीविजन को लेकर, ऐसा नहीं है कि कोई कायदे-कानून नहीं हैं, केबल टेलीविजन नेटवर्क रूल के मुताबिक कोई भी चैनल अपने कार्यक्रमों और विज्ञापनों में अंधविश्वास फैलाने, जाति, धर्म, लिंग और उम्र के आधार पर भेदभाव फैलाने वाली विषयवस्तु नहीं दिखा सकता है। वास्तविकता यह है कि हमारे टेलीविजन चैनलों में जनविरोध पर आधारित इस सब की ही भरमार ज्यादा देखने को मिलती है। हर चैनल नियमों का खुलेआम उल्लंघन करता है, अपराध करता है। उनके कार्यक्रमों में भविष्य बताने वाले पाखंडी जोगियों से लेकर गोरेपन की क्रीम बेचने वाले रंगभेदी विज्ञापन धड़ल्ले से दिखाए जाते हैं और हमारी लोकतांत्रिक सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती है। स्वनियमन की बेशर्म वकालत करने वाले मालिकों की जेबी संस्थाएं भी इस स्थिति से हमेशा आंखें मूंदे रहती हैं। लेकिन जब-जब इन स्थितियों में बदलाव की मांग उठने लगती है तो सरकार और उद्योगपतियों की तरफ से यही सुनने को मिलता है कि जैसे इन हालात पर उनसे ज्यादा चिंतित और कोई नहीं।

विज्ञापनों का प्रतिशत और समाचार माध्यम
समाचार माध्यमों में कितने विज्ञापन होने चाहिए भारत में यह बहस काफी पुरानी है। टीवी के देश में इतना प्रचलित होने से बहुत पहले प्रिंट माध्यम को लेकर भी यह बहस रही है। पचास के दशक की शुरुआत में पहले प्रेस आयोग ने पाठकों के हितों को ध्यान में रखते हुए अखबार में कम से कम साठ फीसदी समाचार और ज्यादा से ज्यादा चालीस फीसदी विज्ञापन छापने की वकालत की थी। इसे ध्यान में रखकर बाद में द न्यूजपेपर (प्राइस एंड पेज) एक्ट 1956 बनाया गया। मीडिया मालिकों ने तब भी तमाम किस्म की जोड़-तोड़ के बाद, यहां तक कि कोर्ट का सहारा लेते हुए भी इसे लागू नहीं होने दिया। यही वजह है कि आज यह बीमारी सारे संचार माध्यमों में फैल चुकी है। जब-जब भी मीडिया के नियमन की बात की जाती है मालिक लोग तुरंत ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता समेत कई किस्म के विचित्र बहानों को लेकर सामने आ जाते हैं और संचार माध्यमों पर नियंत्रण के कारण कामयाब भी रहते हैं। इसने मीडिया की अराजकता को इन वर्षों में बढ़ाया ही है। आज जिस तरह से प्रिंट, टीवी, रेडियो और इंटरनेट का जितना असीम विस्तार हुआ है उसे देखते हुए मीडिया परिदृश्य के लिए कुछ ठोस कायदे-कानूनों का होना जरूरी हो गया है अन्यथा स्वयं मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग के चलते खुद लोकतंत्र के लिए खतरे में बदल गया है। पेड न्यूज और मास मीडिया पर अवांछित तत्वों का बढ़ता स्वामित्व इसका उदाहरण है। इसे हाल के शारदा चिट फंड घोटाले के माध्यम से भी समझा जा सकता है जिसने अखबारों और चैनलों के माध्यम से जनता को ठगने और सत्ताधारियों व राजनीतिक नेतृत्व को सफलता पूर्वक प्रभावित करने का काम किया है।
आज मीडिया के जनता को प्रभावित करने से लेकर सत्ता और सरकारों को प्रभावित करने के विभिन्न पहलू को ध्यान में रखते हुए उसके संपूर्ण नियमन की तत्काल जरूरत है। हाल के दौर में बड़े-बड़े पूंजी संगठन सभी तरह के मीडिया में पैसा लगाकर उस पर कब्जा करने या स्वयं बड़े मीडिया संस्थान एकाधिकार का विस्तार करने में लगे हैं। इस साल ट्राइ ने ही मीडिया के मालिकाने के नियमन के लिए दूसरी बार एक और कंसल्टेशन पेपर जारी किया था। इसमें बड़े-बड़े मीडिया कांग्लोमरेटों की तरफ से क्रॉस मीडिया ओनरशिप पर कुछ रोक लगाने की वकालत की गई है। मध्य फरवरी में जारी किए गए इस पेपर पर सभी हिस्सेदारों की तरफ से जवाब देने की आखिरी तारीख बाईस को खत्म हो गई है। एक बार फिर मीडिया मालिक मालिकाने के नियमन के खिलाफ एकजुट हैं। इससे पहले भी ट्राइ मई 2008 में एक कंसल्टेशन पेपर जारी कर चुका है और मालिक उसे गलत ठहराने की कोशिश करते रहे हैं। अगर जनता का दबाव रहा तो एक न एक दिन सरकार को अपना ढुलमुल रवैया छोड़कर नागरिकों के पक्ष में नियम बनाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा लेकिन फिलहाल ऐसी कोई सूरत नहीं दिखती है।
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि मीडिया को बाजार और मुनाफे का पर्याय बनाए जाने की वजह से ही वर्तमान मीडिया परिदृश्य बना है, जिसमें लोगों को एक नागरिक के तो छोड़ दीजिए उपभोक्ता के अधिकार पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। दूसरी ओर एकाधिकार बढ़ा है और समाचार माध्यमों के स्तर में गिरावट आई है।

चिट फंड घोटाला और समाचार
इस संदर्भ में पश्चिम बंगाल में सक्रिय शारदा चिट फंड कंपनी की वजह से राज्य की राजनीति में मचे तूफान पर नजर डालना जरूरी है। कंपनी हजारों जमाकर्ताओं के खून पसीने की कमाई डुबा चुकी है। उसके मालिकों और राज्य की तृणमूल सरकार व कांग्रेस के कुछ नेताओं के संबंध सामने आ चुके हैं। इस मामले में भी राडिया कांड की तरह ही आर्थिक घोटाले, मीडिया और राजनीति का घातक घालमेल सामने है। बाजार में अपनी छवि बनाए रखने के लिए इस चिट फंड ग्रुप ने अपने अवैध काम को आसानी से चलाने के लिए जनता से वसूले गए पैसे का बड़ा हिस्सा समाचार माध्यमों में लगाया था। अंग्रेजी अखबार बंगाल पोस्ट समेत यह कंपनी, सकालबेला, आजाद हिंद, प्रभात वार्ता, सेवन सिस्टर्स पोस्ट, तारा न्यूज, तारा म्यूजिक और तारा बंगला जैसे कई अखबार और टेलीविजन चैनल चलाती थी।
कंपनी के अंग्रेजी अखबार बंगाल पोस्ट के दिल्ली ब्यूरो में काम कर चुकी सीमा गुहा ने टू हूट वेबसाइट में अपने अनुभवों को विस्तार से लिखा है। उनका कहना है कि मालिक सुदीप्तो सेन खुलेआम उनको तृणमूल का पक्षधर होने की अपनी बाध्यता बताता था और तृणमूल एमपी कुनाल घोष के माध्यम से वह मीडिया संस्थान के लिए पैसा जुटाने की कोशिश कर रहा था। अब भले ही कुणाल घोष का कहना हो कि वह सिर्फ कंपनी का पेड कर्मचारी था लेकिन इस पत्रकार ने अपने अनुभवों से बताया है कि घोष इस ग्रुप के साथ बहुत गहराई से जुड़ा रहा है।
शारदा का तो आखिरकार भड़ा-फोड़ हो गया है और उसके मालिक अब कानून की गिरफ्त में हैं। लेकिन एक और चिट फंड कंपनी और अनऔपचारिक वित्तीय धंधा करनेवाली कंपनी सहारा के खिलाफ भी सेबी लगातार आवाज उठा रही है। शारदा की तरह ही सहारा पर भी वित्तीय अनियमित्तताओं के आरोप हैं जिनकी जांच चल रही है। कोर्ट ने उसे छोटे जमाकर्ताओं का चौबीस हजार करोड़ रुपया लौटाने को कहा है लेकिन सहारा का मालिक अब भी जोड़-तोड़ कर बचने की कोशिश में लगा हुआ है। ये दोनों प्रसंग अवांछित तौर पर पैसा कमाने में लगे संस्थानों के मीडिया का इस्तेमाल करने का बड़ा उदाहरण हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि सहारा स्वयं एक बड़ा मीडिया संस्थान चलाता है।
सच यह है कि सरकारों को इस तरह की कंपनियों की गतिविधियों के बारे में सब मालूम रहता है लेकिन वे जानबूझ कर इनके खिलाफ कोई कार्रवाही नहीं करतीं। इसकी कई वजहें होती हैं। जनता से पैसा ठग कर उसे राजनेओं को देने से लेकर राजनेताओं द्वारा कमाए काले पैसे को सफेद करने या उसे रखने का काम करने तक। ये कंपनियां शारदा और सहारा की तरह विश्वसनीयता हासिल करने के लिए मीडिया में निवेश करती हैं। इससे पहले नब्बे के दशक में कुबेर और जेवीजी जैसी चिट फंड कंपनियां जनता की गाढ़ी कमाई को लूटकर गायब हो गई थीं। उन्होंने भी मीडिया का इस्तेमाल करने के लिए कुबेर टाइम्स और जेवीजी टाइम्स जैसे अखबार शुरू किए थे। चिट फंड का साम्राज्य डूबने के साथ ही ये अखबार भी डूब गए। जिसके बाद बड़ी संख्या में पत्रकार बेरोजगार हो गए थे। उसी तरह अब शारदा ग्रुप में काम करने वाले करीब डेढ़ हजार पत्रकार सड़क पर आ गए हैं। मीडिया में इधर बिल्डरों ने भी बड़े पैमाने पर निवेश किया है। आज कई ऐसे चैनल और पत्र-पत्रिकाएं हैं जो बिल्डरों और डेवलपर्स की हैं। चिट फंड व अनौपचारिक वित्तीय संस्थाओं तथा बिल्डरों-डेवलपर्स में निकट का संबंध है।
इस घटना के सामने आने से निजी मीडिया स्वामित्व के नियमन का मुद्दा एक बार फिर महत्त्वपूर्ण हो जाता है। आखिर चिट फंड कंपनियों को मीडिया में निवेश करने की इजाजत क्यों होनी चाहिए या किसी भी दूसरे धंधे में जुटी कंपनी को मीडिया, खास तौर पर समाचार मीडिया में निवेश की इजाजत क्यों होनी चाहिए? क्या ऐसा होने पर समाचार मीडिया की स्वतंत्रता संभव है? क्या व्यापारी घराने मीडिया का इस्तेमाल निजी स्वार्थों के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे? करते? जैसे, क्या शारदा ग्रुप के पत्रकार अपने मालिक की करतूतों के खिलाफ अपने मीडिया में रिपोर्ट कर सकते थे? क्या वे मालिक के करीबी तृणमूल कांग्रेस की नीतियों की आलोचना कर सकते थे? या उस तरह से किसी भी शासक दल के खिलाफ कोई चिटफंड कंपनी बोलने की हिम्मत रख सकती है? इस तरह मीडिया में मालिकाने के नियमन का सवाल राजनीति और आर्थिक कारोबार के कायदों से भी जुड़ा है। इस असलियत की अनदेखी की जाती रही तो वह दिन दूर नहीं होगा जब देश मीडिया पर ऐसे लोगों का कब्जा हो जाएगा जिनकी आर्थिक गतिविधियां सदा शंकास्पद रहेंगी औरजो इन माध्यमों के माध्यम से आप जनता को ठगने का काम कर रहे होंगे।
मीडिया नियमन इसलिए भी जरूरी है कि बड़े व्यापसायिक घरानों द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मीडिया पर कब्जे के कारण और उनके और उनकी सहयोगी राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ कभी कोई ऐसी खबर नहीं आ पाएगी जो सच होने के बावजूद इन के खिलाफ हो। इस बात की शुरुआत मुकेश अंबानी ने नेटवर्ट 18 और इनाडु टीवी को हथिया कर और आदित्य बिड़ला ग्रुप ने टीवी टुडे ग्रुप के सत्ताईस फीसदी शेयर खरीदकर कर दी है। मुकेश के छोटे भाई अनिल अंबानी का भी कई मीडिया संगठनों में पैसा लगा है। पत्रकारों की एकजुटता बहुत हद तक इस स्थिति से उन्हें और पत्रकारीय नैतिकता को बचा सकती है, उनकी सांगठनिक ताकत मालिकों के सामने झुकने से मना कर सकती है। लेकिन हाल के दौर में जिस तरह मालिकों ने कुछ पत्रकारों को बड़ी-बड़ी तनख्वाह देकर खरीद लिया है, इस स्थिति ने पत्रकारों के संगठन बनाने की बात को ही हास्यास्पद बना दिया है। यही वजह है कि आज ज्यादातर मीडिया संस्थानों में पत्रकार संगठन की बात करना पूरी तरह वर्जित है। ठेके पर काम करने की वजह से उन्हें हमेशा नौकरी जाने का डर लगा रहता है और वे न्याय के पक्ष में कोई आवाज नहीं उठा पाते। पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा करने वाले वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट का नाम भी आज कई पत्रकार नहीं जानते। पत्रकार संगठनों को अवांक्षित घोषित कर निजी मीडिया संस्थानों और सरकार ने मिलकर एक तरह से पत्रकारों को रीढ़ विहीन बना रखा है।

Tuesday, 22 October 2013

                      मीडिया कल  और आज....


कहते है परिवर्तन प्रकृति का नियम होता है , और ये भी सही है कि  प्रकृति  में होने वाला हा परिवर्तन मानव जाती के अनुकूल हो।  खैर ये तो प्रकृति की बात है पर समाज में कुछ ऐसे भी परिवर्तन होते  है जो मानवजाति द्वारा होता है , अक्सर मानव समाज अपने फायदे के लिए ही ऐसे परिवर्तन  करते है।  आज  मै  यहाँ  परिवर्तन पर चर्चा  नहीं कर रहा हु बल्कि  समाज में उंचा ओहदा प्राप्त एवं समाज का चौथा स्तम्भ कहा जाने वाला या माने जाने वाला  मीडिया में हो रहे परिवर्तन व इसका  सामाजिक उत्तरदायित्व  से   मुह  मोड़ना तथा फायदे की भूख में नैतिकता को अनदेखा करने   सम्बंधित परिवर्तन से आप लोगो को सूचित करना   है।  मीडिया में हो रहे परिवर्तन  और इसका समाज पर पड़  रहा बुरा प्रभाव को समझने के लिए मैंने महफूज आलम रिजवी द्वारा लिखित ब्लॉग "मीडिया का चरित्र ,उम्मीद अभी बाकी"  को अपने  ब्लॉग के साथ जोड़कर आप लोगो के सामने  रख रहा हूँ , आशा करता हु इससे आप को मीडिया का बदलता चेहरा व मीडिया हित समझने में आसानी होगी। 

  परिस्थितियों का चरित्र हमेशा परिवर्तित होता रहा है। समय और सापेक्षता का सिद्धांत भी स्थायी नहीं है। विचार-व्यवहार बदलते रहे हैं। ऐसे में, सिर्फ इसलिए कि अब तक लोग मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पुकारते या मानते रहे हैं, परंपरा का निर्वाह करते हुए हम भी इसे ऐसा ही मानें, यह कतई ज़रूरी नहीं है। स्वतंत्रता पूर्व और स्वतंत्रता के बाद की पत्रकारिता। नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के दौर वाली पत्रकारिता और फिर इसके बाद की पत्रकारिता। ये कोई परंपरागत विमर्श-पद्धति वाला वर्गीकरण नहीं है। बल्कि ये बस काल-परिवर्तन और परिदृश्यगत् बदलाव के अनुरूप मीडिया के कायांतरण की महज सीढ़ियां हैं। पत्रकारिता समाजसेवा के जुनूनी दौर को अरसा पहले ही अलविदा कह चुकी है। अन्याय और अनीति के ख़िलाफ़ विद्रोह का शंखनाद फूंकने वाले तो हैं लेकिन अब शंख पर बाज़ार का कब्जा है।
बाज़ार ने मीडिया का कायाकल्प कर दिया है। मीडियाकर्मी अब समाज में व्याप्त बुराइयों और व्यवस्था की दगाबाज़ियों को उजागर करनेवाला हरावल नहीं रहा। वह अब बाज़ार का टूल यानी औज़ार बन गया है। बाज़ार और सत्ता प्रतिष्ठानों के बीच इसकी भूमिका टाउट यानी बिचौलियों वाली रह गई है। सन 1780 में जब बंगाल गजट जैसे समाचार पत्रों का प्रकाशन प्रारंभ हुआ था तो उसका मकसद भी अंग्रेजी हुकूमत और भारतीय जन मानस के बीच बढ़ती खाई को पाटना ही था। ठीक उसी तरह, जैसे कांग्रेस नाम के संगठन की नींव, अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बढ़ रहे आक्रोश को शांत करने और सशस्त्र क्रांति की आशंका को खत्म कर, प्रबुद्ध वर्ग को अंग्रेजी सत्ता का सिपहसालार बनाने की ग़रज़ से ही रखी गई थी।

जेम्स ऑगस्टस हिक्की हों या ए ओ ह्यूम। दोनों का मकसद समन्वय ही था(समन्वय शब्द इसलिए क्योंकि ये लोग इतिहास पुरुष हैं और इनके लिए मध्यस्थ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया जाता)। यहां पर बराबरी-गैर बराबरी के झमेले में उलझने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन इस बात से भी आप इनकार नहीं कर सकते कि ये दोनों ही येन-केन-प्रकारेण देश-समाज में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति घर करती घृणा और आक्रोश को कम करने की कोशिश कर रहे थे। ये अलग बात है कि अंग्रेजों ने समन्वय के जिन हथियारों का इस्तेमाल अपनी सत्ता को भारत में सुदृढ़ करने के लिए किया, वही कालांतर में उनके खिलाफ इस्तेमाल हुए और घातक भी सिद्ध हुए। अख़बार और पत्र-पत्रिकाओं का स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रभाव किसी से छुपा नहीं है। कांग्रेस की कथा भी बहुत कुछ वैसी ही है।
ख़ैर, हम राजनीतिक इतिहास की पड़ताल करने नहीं बैठे हैं। हमारा मक़सद मीडिया के वर्तमान चरित्र को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और चरित्र की पड़ताल मात्र है। क्या हम इसे महज इत्तेफाक मान लें कि सन 1927 में रेडियो और आज़ादी के बाद सन 1959 में भारत में टेलीविज़न प्रसारण के शुभारंभ का मक़सद भी बहुत हद तक समाजसेवा ही था? किसानों को खेती से जुड़ी जानकारियां देना, ताकि कृषि के क्षेत्र में क्रांति आ सके। शिक्षा के प्रति लोगों को जागरुक करना। रोज़ी-रोजगार के बारे में सूचना देना। सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार और इनके खिलाफ जनमत तैयार करना आदि।

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के दौर तक भारतीय मीडिया और मीडियाकर्म से जुड़े लोग, दोनों ही अपने चरित्र और व्यवहार में जन हितैषी ही रहे। महत्वकांक्षी संजय गांधी के दबंग रुख़ और सत्ता प्रतिष्ठान की पहली टेढ़ी नज़र के बाद ही बहुत से चेहरे बेनक़ाब होने लगे। अलग बात है कि पानी अभी भी बाक़ी रहा। लोग इस पेशे को पेशा कम, सेवा ज्यादा मानते रहे या कि ये धारणा इतनी आकर्षक थी कि बिगड़ी नहीं, बनी ही रही। सत्ता से लेकर समाज तक में मीडियाकर्म और कर्मी दोनों सम्मानजनक स्थिति में ही रहे। ठीक उसी तरह जैसे डॉक्टर और टीचर। 90 का दशक तो ख़ैर फिर भी ठीक-ठाक ही रहा। हालांकि गुपचुप पेड न्यूज़ जैसी प्रवृति घुसपैठ कर चुकी थी। बेशर्मी टाइम्स ग्रुप से शुरू हुई और 20वीं सदी के अंतिम दशक ने सबकुछ उलट-पुलट कर दिया।
                 

उदारीकरण की आंधी ने मीडिया के समाजसेवी होने का दंभ तोड़ा तो मीडियाकर्मियों के सम्मान का कीर्ति-स्तम्भ भी डवांडोल हुआ। समाचार पत्रों के मालिकों ने अब कथित संभ्रांत और समाजसेवी, साहित्यशिल्पियों के हाथ से कमान छीननी शुरू कर दी। उन्हें अब सारगर्भित लेखों और विचारोत्तेजक संभाषणों के सिद्धहस्तों की ज़रूरत नहीं रही। वहां वैसे लोगों की पूछ बढ़ी जो सत्ता के गलियारे में अपनी पैठ रखते हों, जो कॉर्पोरेट हित में मीडिया एथिक्स को ठेंगा दिखा सकते हों। थोड़ी बेहयाई बरतें तो ये कि कॉर्पोरेट दलाली में माहिर हों। उदारीकरण की कोख से जन्मी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो इस मामले में प्रिंट को बुरी तरह से चित कर दिया।
दूरदर्शन के सरकारी भोंपू बनने का भी यही दौर था। निजी न्यूज़ चैनलों की होड़ का भी यही ज़माना था। लोगों ने दूरदर्शन को सरकार का तोता गरदानते हुए, आजतक, स्टार न्यूज़, ज़ी न्यूज़ और नई दिल्ली टेलीविज़न(जिसे लोग एनडीटीवी के नाम से जानते हैं) को सिर-आंखों पर बिठाना शुरू कर दिया। बीबीसी बोले तो पक्की ख़बर से छिटक कर लोग सबसे तेज़ बोले तो आज तक, सबसे सटीक बोले तो एनडीटीवी जैसे मुहावरों की गिरफ्त में आ गए। शुरूआती दौर जैसा कि हमने शुरू में ही कहा है, बड़ा ही आकर्षक और हृदयग्राही हुआ करता है। यहां भी रहा। निर्भीक रिपोर्टिंग, बेबाक टिप्पणी, लाजवाब प्रजेंटेशन और जनहित से जुड़े मुद्दे उठाने वाले तमाम महारथी यहां भी थे(बिल्कुल प्रिंट मीडिया की ही तरह)। लेकिन अचानक टीआरपी डायन बीच में आ गई। पत्रकारिता का बुखार उतरने लगा। बाज़ार का नशा चढ़ने लगा।
दिखना था, लिहाजा खादी की झोली और पजामा-कुर्ता से काम नहीं चल सकता था। अच्छे कपड़े के लिए अच्छी आमदनी चाहिए थी। अच्छी आमदनी के लिए बाज़ार के नज़र-ए-करम की दरकार थी। सबसे बढ़कर मालिक की फटकार और नौकरी जाने का ख़ौफ़, रेवेन्यू जेनरेट करो या फिर बाहर जाओ।
सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरी घटी। निजीकरण ने नये सपने बांटे। जो यहां अनफिट सिद्ध हुए(या यूं कह लें कि मौका नहीं पा सके), वो इधर चले आए। नये रंगरूटों ने मीडिया एथिक्स पढ़ा तो था, लेकिन लोगों को समझाने के लिए, दूसरों को गरियाने के लिए। अपने लिए तो जो हम कह रहे हैं, वही सही है। यहां तो ऐसे ही चलेगा। चलने भी लगा। पत्रकार जो पहले सच के सामने किसी की कुछ भी नहीं सुनता था, वो अब या तो बेरोजगार होने लगा या फिर मालिक के निर्देश पर सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े प्रभावशाली लोगों को संस्थान के लिए, संस्थान के मालिक के हित के लिए सेट करने लगा।

बाज़ार ने टार्गेट व्यूअर यानी दर्शक तय कर दिया। ख़बरें वही हैं, जो उपभोक्ता के हित में है, बाज़ार के हित में है। सरकार ने विज्ञापन की रेवड़ थमा दी और साथ में अघोषित संदेश भी कि ख़बरें वही जो सरकार के हित में है। मीडिया अब उद्योग बन गया। पत्रकार अब पेशेवर होने लगे। संस्थान अब मुनाफा ढूंढने लगा। नेता अब स्पेस डिमांड करने लगे। बाज़ार चमक-दमक और आकर्षण मांगने लगा। स्वतंत्रता की आग, अन्याय का विरोध, जन सरोकार, आम आदमी की आवाज़.., सब बीते हुए साल के कैलेंडर के दिन-तारीख़ बनते चले गए। मीडिया में जो बाक़ी बचा, वो खांटी व्यापार था।
स्लोगन भी देखिए, जो दिखता है वो बिकता है। यानी बार बालाओं का डांस, दुष्कर्म नहीं, बलात्कार और रेप की ख़बरें। हिरोइनों के नखरे। बिकनी और बिरयानी की बात। ब्रांड और कम्पनियों की बात। भूत, धरती पर ख़तरा, नर्क का देवता, स्वर्ग की शाम या फिर कहीं किसी कारण से सियासी बवाल और नेता का बयान। हां, कभी-कभार अगर सरकार विज्ञापन में आनाकानी बरते तो फिर जनहित और सरकार की विफलता भी ख़बरों में शुमार होने लगे।
साहित्य की तो ख़ैर बात ही छोड़ दीजिए, ख़बरों की परिभाषा भी बदल दी गई। खेल बोले तो क्रिकेट हो गया। जनहित बोले तो सत्ताधारी दल का भोंपू। मनोरंजन बोले तो फिल्मों का प्रोमोशन। हिरोइनों के निजी संबंध। हिरोइनों के कपड़ों की नाप-जोख, नख-शिख वर्णन(टीवी का रीति काव्य)। सोप, सीरियल, धारावाहिक, द्विअर्थी संवादों से लोगों को विभत्स रस में भिंगोने वाले मसख़रे और उनकी आं-उं.., सबकुछ न्यूज़ बन गए। न्यूज़ की चौहद्दी से दूर जो रह गया वो ख़बरें थीं। वो जनहित से जुड़े सवाल थे।
कभी बोरवेल टीआरपी वाला साबित हुआ तो कभी किसी बेबस आदिवासी युवती का चीरहरण कांड। कभी पुलिस की लाठियां, तो कभी फायरिंग। कभी आशिक की पिटाई तो कभी पत्नी की हिम्मत। कभी अश्लील डांस और इसकी थू-थू की आड़ में पूरा का पूरा कोकशास्त्र ही प्रस्तुत कर दिया गया। जबकि इसी बीच कहीं कोई महिला न्याय के लिए अनशन पर बैठी और वहां से सीधे श्मशान जा पहुंची। मीडिया तक ख़बर ही नहीं पहुंची। मीडिया बहुत ज्यादा पिपुल्स फ्रेंडली हुआ तो टॉक शोज आ गए। चार चों-चों नेताओं को स्टूडियो में बिठा लिया। टॉपिक क्या, बस कुछ भी, कैसा भी। फिर आप ग़लत, मैं सही। मैं सही, आप ग़लत। इसी बीच नेताओं की थुक्कम-फजीहत, तू-तू, मैं-मैं, इनका इतिहास, उनका परिहास।
दिखने वाला बिकने लगा। माफ कीजिएगा, बिकने लगी। मीडिया में आजकल इसका भी बहुत क्रेज़ है। औरतों के मानसिक और सामाजिक आज़ादी की बात, थोड़ी पीछे रह गई। दिखने और दिखाने पर ज़ोर दिया जाने लगा। औरत प्रोडक्ट हो गई। औरत बाज़ार हो गई। औरत टीआरपी की सरदार हो गई। सरकार को भी मीडिया से आपत्ति तब होती है, जब वो किसानों के साथ विश्वासघात को उजागर कर देती है। मीडिया तब ख़तरनाक हो उठता है, जब वो भ्रष्टाचार या फिर ऐसे ही दूसरे दीमकों की तरफ कैमरा फोकस कर जूम करने लगता है। फिर मीडिया पर कंट्रोल के लिए नयी पॉलिसी और क़ानून की ज़रूरत महसूस होने लगती है। पूरी की पूरी श्रृंखला है। जो काम हिक्की और ह्यूम ने शुरू किया था, वो धीरे-धीरे प्रवृति बन गई। आज का मीडिया और एनजीओ वही सब कर रहे हैं। घोषित कर्तव्य वही पुराना है, अघोषित एजेंडे पर काम हो रहा है। ख़ैर, अगर इन बातों में उलझे तो पूरा उपन्यास तैयार हो जाएगा। हरि अनंत हरि कथा अनंता वाली स्थिति है।
हिन्दुस्तान में मीडिया अपने शुरूआती दौर से लेकर अब तक कई युग, कई रंग और कई रूप ग्रहण कर, छोड़ चुका है। गति को अभी विराम नहीं लगा है। इतिहास के आलोक में उम्मीद बस इतनी सी कि मीडिया फिर से बदलेगा। अभी भले ही इस बुद्धु बक्से और कागज़ के पन्नों पर मुट्ठी भर लोगों का अवैध कब्जा हो। लेकिन बदलाव की उम्मीद बेमानी नहीं है। सरकार, कॉर्पोरेट और मीडिया मुग़लों के हित। इन तमाम चीज़ों को झेलता पत्रकार या मीडियाकर्मियों का बड़ा तबका, कल भी बेचैन था, आज भी है। बस इंतज़ार इतना सा कि शंख इनके हाथ लगे। शंखनाद में समय नहीं लगता।

Sunday, 20 October 2013

                "वैश्वीकरण में मीडिया एवं मीडिया की नैतिकता"



    मीडिया   का समाज के विकास में महती भूमिका होती है , मीडिया द्वारा दिखाई व बताई जाने वाली बातो पर लोगो का विश्वाश इस कदर होता है जैसे ब्रहमा के मुख से निकल शब्द। मीडिया  को समाज का आईना  जनता की आवाज और ना जाने ऐसी कितनी टैग लाईनों  से सजाया  जाता है।  पर वर्तमान  में ये एक बहुत  बड़ा प्रश्न  है,  कि  मीडिया जो  दिखाती  या बताती है  वास्तव में उसमे कितनी सच्चाई  होती है।  बदलते वक़्त के साथ आज मीडिया भी बदल गयी है कभी जो मीडिया लोगो के हित के लिए खडा  हुआ करती थी आज कुछ मीडियाकर्मियो   व मीडिया मालिको के वजह से खुद के फायदे के बारे में सोचती है।  मीडिया में बढ़ते  बाजारीकरण व वैश्वीकरण से  तमाम नैतिकता सम्बंधित प्रश्न उठे है।  इस विषय को  गंभीरता से समझने  के लिए  मैंने "विवेक विश्वास एवं धनेश कुमार जोशी" द्वारा प्रकाशित "वैश्वीकरण में मीडिया एवं मीडिया की नैतिकता"  नामक लेख को अपने ब्लॉग के साथ जोड़कर आप लोगो के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। 
          
         वैश्वीकरण    में अधिकतम सामाजिक और सांस्कृतिक अन्तर्विरोध निहित हैं। इसका संबंध पूंजीवाद तथा उसमें निहित शक्तियों  के अन्तर्विरोधों से है। वैश्वीकरण प्राथमिक रूप से आजादी और आत्मनिर्भरता को समाप्त करता है तथा लोगों को पर-आश्रित बनाकर गुलाम मानसिकता में जकड़ लेता है। पूंजीवाद तथा उसमें निहित शक्तियां यह कार्य वैश्वीक जनमाध्यमों,संचारप्रणाली तथा विभिन्न प्रचार माध्यमों के जरिये करता है। वैश्वीकरण के इस वर्तमान दौर में “समाज में नयी परिस्थितियों के अनुरुप नयी कतारबंदी शुरु हुई है”1 । यह कतारबंदी उन चंद लोगों की है जिनके हांथों में अधिकतम संसाधन और आर्थिक शक्तियां निहित हैं। यह कतारबंद लोग किसी एक समाज और देश से नहीं आते। परन्तु अलग-अलग समाज और देशों से होने के बावजूद भूमंडलीकरण के ये पैरोकार स्वयंभू शैली में अपने को'विश्व नागरिक' घोषित कर बड़ी आसानी से अपने मूल उद्देश्यों और व्यावसायिक हितों को छुपा लेते हैं। अब स्वयंभू शैली में अपने को 'विश्व नागरिक' घोषित करने वाले ये वैश्विक रणनीतिकार अपने मूल उद्देश्यों और व्यावसायिक हितों को पूरा करने के लिए विभिन्न संचार प्रणालियों अर्थात मीडिया का इस्तेमाल बहुत ही सधे कदमों के साथ करते हैं। इन्हीं रणनीतियों के भंवर फंस कर हमारे विभिन्न जनमाध्यम जो पहले अपने पेशे को पत्रकारिता का नाम देते थे अब मीडिया के रूप में अपनी पहचान बनाने में लगे हैं। यहाँ सवाल ‘पत्रकारिता’ शब्द के जगह ‘मीडिया’ शब्द के प्रयोग का नहीं है बल्कि शब्दों के साथ उद्देश्यों, सरोकारों और नैतिक मूल्यों में बदलाव का है। जिस तरह ‘मम्मी’ शब्द से ‘माँ’ जैसे भाव और लगाव नहीं जुड़ सकता ठीक उसी प्रकार मीडिया कभी पत्रकारिता के उद्देश्यों और सरोकारों को आत्मसात नहीं कर सकती। जैसा सर्वविदित है और पूर्व में भी साकेत किया जा चुका है कि वैश्वीकरण का सीधा-सीधा संबंध पूंजीवाद से है तथा नैतिकता एक सामाजिक मूल्य है और कहते हैं पूंजी की कोई नैतिकता नहीं होती। यहाँ यह भी स्पष्ट करना बेहद जरूरी है कि धन और पूंजी दोनों अलग-अलग चीजें हैं, धन का अस्तित्व नैतिक और सामाजिक मूल्यों के साथ होता है जबकि पूंजी हमेशा खुद को इन मूल्यों से परे रखती है। पूंजी का उदेश्य ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना तो होता ही है साथ ही तेजी से पूंजी में इजाफा करने के लिए परिस्थियों का निर्माण करना भी होता है । यही वजह है कि पत्रकारिता जैसे ही मीडिया व्यवसाय के रूप में तब्दील हुई वैसे ही, भले ही मीडिया व्यवसाय को अन्य व्यावसायों से अलग करके देखा जाता रहा, परंतु आज का मीडिया प्रबंधन अन्य व्यवसायों की तरह मुनाफे और पूंजी के विस्तार के लिए मीडिया का इस्तेमाल भी दुधारू गाय की तरह करने लगी और इसके लिए हर सीमाएं एवं वर्जनाएं टूटने लगी चाहे इसके लिए उन्हें किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े। जिसके कारण पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार सामाजिक और नैतिक मूल्यों का ह्रास देखा जा रहा है।

           वैश्वीकरण का पर्यावाची शब्द है भूमंडलीकरण और “भूमंडलीकरण के आलोचकों का कहना है कि यह बड़े व्यवसायों और अमीरों के समर्थन में है और श्रम, पर्यावरणवादियों, गरीबों और उन सभी की क्षमताओं को कम करके आंकती है  जो अपनी नियति का निर्माण खुद करते हैं। भूमंडलीकरण में ऐसी विशिष्ट अलोकतांत्रिक प्रवृति को भी देखा जाता है जो राष्ट्रीय सरकारों को बाध्य करती हैं कि या तो वे भूमंडलीकरण रूप में गतिशील पूंजी की जरूरतों को पूरा करे या फिर आर्थिक रूप से अपने सफाए का सामना करने के लिए तैयार हो जाए।“2  यहाँ वैश्वीकरण (भूमंडलीकरण) के आलोचकों ने वैश्वीकरण के उस अलोकतांत्रिक प्रवृति की ओर इशारा किया है जो पूंजी की जरूरतों को पूरा नहीं करने की स्थिति में राष्ट्रीय सरकारों को भी आर्थिक रूप से सफाए का सामना करने के लिए मजबूर कर सकती है। इन परिस्थितियों में मीडिया आखिर कब तक पूंजी और बाजार के आगे नतमस्तक हुए बिना नैतिकता का ध्वजवाहक बना रहेगा। वह भी तब जबकि इस तथ्य से हम सब अवगत हैं कि सामाजिक मूल्य और नैतिकता वस्तुनिष्ठ चीजें हैं और एक ही समाज में रहने वाले अलग-अलग समूहों और व्यक्तियों के लिए भी नैतिकता की परिभाषा एवं मानदंड अलग-अलग हो सकते हैं। फिर उस दौर में जब हमारी सरकार सूचना एवं प्रसारण क्षेत्र में एफडीआई की सीमा 49प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर दी है, मीडिया से किस हद तक नैतिक होने का उम्मीद हम कर सकते हैं? चूँकि बाजार को अपना विस्तार करना है इसलिए उसे विदेशी पूंजी की जरूरत है, स्वाभाविक है पूंजी की जरूरतों को पूरा नहीं करने की स्थिति में सरकार को आर्थिक रूप से अपने सफाए का डर सता रहा है, फलस्वरूप अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ सूचना एवं प्रसारण क्षेत्र में भी एफडीआई की सीमा 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर दी गई है। अब सवाल यह है कि जब पूंजी की जरूरतों के आगे ताकतवर सरकारें नतमस्तक हैं तब खुद मुनाफा की इच्छा रखने वाले मीडिया समूहों और इन समूहों के पूंजीपति मालिकानों से हम कैसे उम्मीद रखें कि वह पूंजी की जरूरतों के आगे अपने नैतिक मूल्यों की बली नहीं देंगे। अमेरिका के जनसंचार अध्येता एडवर्ड एस. हर्मन और रॉबर्ट मैक्चेस्नी का भी मानना है कि “भूमंडलीय निगम पूंजी की ताकत सिर्फ आर्थिक और राजनितिक ही नहीं है, बल्कि इसका विस्तार विचार की बुनियादी मान्यताओं और रूपों तक है, जिसे कि हम विचारधारा कहते हैं।“3 अगर कोई पूंजी विचार की बुनियादी मान्यताओं और रूपों तक को प्रभावित करती है तो उसके साथ ही स्थापित नैतिक मूल्य भी बदलेंगे। क्योंकि किसी भी बुनियादी मान्यताओं का सृजन बगैर नैतिक मूल्यों के समावेश के नहीं हो सकता।   

        “किसी देश या समाज-विशेष की देखरेख में संचालित होने वाले लोक-प्रसारण माध्यमों के सामजिक सरोकार और उनके कार्य-भार जहां उन्हें औरों से अलग करते हैं, वहीं उस समाज के प्रति बढ़ती जवाबदेही और क्रिया-कलाप उनकी भूमिका को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण भी बना देते हैं।“4 परन्तु वैश्वीकरण के दौर में मीडिया समाज से अधिक बाजार के प्रति जवाबदेह हो गई है और नैतिकता जैसे मूल्यों को शायद पुराने फैशन के रूप में देखा जाने लगा है। यही वजह है कि “सीमित स्वामित्व की ओर बढ़ते आधुनिक रुझान के कारण लोकतंत्र के लिए आवश्यक सांस्कृतिक परिस्थितियों को नकारा जा रहा है। विडंबना यह है कि कई बार ऐसा स्वतंत्रता के नाम पर किया जा रहा है।“5  सीधे शब्दों में कहा जाए तो ‘वैश्वीकरण’ के विस्तार और मजबूती के लिए मीडिया का बेजां दोहन किया जा रहा है जिसके लिए नैतिकता को नेपथ्य के पीछे धकेल दिया गया है, विश्व की शक्तिमान राजनितिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ताकतों के द्वारा विकासशील और पिछड़े देशों पर नियार्तित विचारधारा और संस्कृति थोपा जा रहा है, पश्चिमीकरण की घुट्टी इस तरह पीला दिया गया है कि नैतिकता को हम रूढ़ीवाद से जोड़कर देखने लगे हैं। अगर भविष्य के तरफ हमें देखना है तो किसी भी परिस्थिति में वैश्वीकरण के इस जकरण से खुद को आजाद करना होगा तथा नैतिक मूल्यों का बचाव करते हुए मीडिया के गिरते साख को बचाना होगा, जिससे कि यह सुनने से बचा जा सके कि “ मीडिया की नैतिकता! यह कैसा मजाक है भाई” ।